अग्निचक्र का जागरण
दृश्य एक – प्रस्तावना (रात, ब्रह्मांडीय संकेत) घना अंधकार. धीरे- धीरे आकाश में तारे उभरते हैं. एक लाल तारा असामान्य रूप से चमक रहा है. >“ जब समय अपनी दिशा बदलता है. जब धर्म और अधर्म की रेखा धुंधली हो जाती है. तब जन्म लेता है एक चिह्न. अग्निचक्र. विस्तृत भूमि, नदियाँ, पर्वत, मंदिरों के शिखर. यह है – वीरेंद्रपुर. महल दीपों से जगमगा रहा है. आज पूर्णिमा है. दृश्य दो – राजसभा में भविष्यवाणी राजा वीरेंद्र सिंहासन पर बैठे हैं. महारानी माधवी उनके बगल में. राजपुरोहित वाग्भट्ट अग्निकुंड के सामने खडे हैं. वाग्भट्ट: महाराज, आज की पूर्णिमा साधारण नहीं. ग्रहों की चाल बदल रही है. अग्नि तत्व जागृत होगा. राजा (चिंतित): क्या यह शुभ संकेत है या संकट? वाग्भट्ट: दोनों. अचानक अग्निकुंड की ज्वाला ऊँची उठती है. ज्वाला के भीतर एक प्रतीक दिखाई देता है — घूमता हुआ अग्निचक्र. सभा में सन्नाटा. दृश्य तीन – अर्जुन का परिचय महल का पिछला आँगन. अठारह वर्षीय राजकुमार अर्जुन तलवार अभ्यास कर रहा है. उसकी चाल तेज है, पर मन कहीं और. उसका मित्र विक्रम हँसते हुए आता है. विक्रम: राजकुमार,...